*पाँच दिवसीय क्षमता संवर्धन कार्यशाला का समापन
कौशल बोध के माध्यम से विद्यालयी शिक्षा में ‘जानने से करने’ की ओर बढ़ते कदम*
उत्तराखंड, देहरादून। राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (SCERT), उत्तराखण्ड में पंडित सुंदरलाल शर्मा केंद्रीय व्यावसायिक शिक्षा संस्थान (PSSCIVE), NCERT, भोपाल के सहयोग से “Capacity Building of Teachers for Implementation of Vocational Education at the Middle Stage as per NEP 2020 and NCF-SE 2023” विषय पर आयोजित पाँच दिवसीय क्षमता संवर्धन कार्यशाला का आज समापन हुआ। कार्यशाला में प्रदेश के विभिन्न जनपदों से 35 शिक्षकों ने भाग लिया। कार्यशाला में संदर्भदाता के रूप में केन्द्रीय व्यावसायिक शिक्षा संस्थान भोपाल के प्रोफेसर आशीष सोनी और डॉ. रवि आहूजा ने भाग लिया |
कार्यशाला का मूल उद्देश्य राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 और राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा-2023 की भावना के अनुरूप मध्य स्तर पर व्यावसायिक शिक्षा को अनुभवात्मक, गतिविधि आधारित तथा कार्य-आधारित अधिगम से जोड़ना तथा शिक्षकों को कौशल बोध के प्रभावी क्रियान्वयन हेतु तैयार करना रहा। पाँच दिनों की पूरी यात्रा में इस बात पर विशेष बल दिया गया कि शिक्षा केवल जानने (Knowing) तक सीमित न रहे, बल्कि बच्चों को करने (Doing), अनुभव करने (Experiencing), समस्या पहचानने (Problem Identification), समाधान खोजने (Problem Solving) तथा सृजन करने (Creating) के अवसर भी प्रदान करे।
अगले चरणों में कौशल बोध के विभिन्न आयामों, परियोजना आधारित अधिगम, कार्य-आधारित गतिविधियों, स्थानीय संसाधनों और समुदाय के उपयोग तथा बच्चों को वास्तविक जीवन की परिस्थितियों से जोड़ने पर हैंड्स-ऑन गतिविधियों तथा Learning by Doing के माध्यम से कार्य किया गया। मूल्यांकन और आकलन के तरीकों पर भी विस्तृत चर्चा और प्रदर्शन किया गया जिससे बच्चों की प्रगति का आकलन केवल लिखित परीक्षा से नहीं, बल्कि उनके कार्य, सहभागिता, प्रक्रिया, कौशल और तैयार उत्पाद के आधार पर भी किया जा सके।
कार्यशाला में उद्यमशील मानसिकता (Entrepreneurial Mindset) पर विशेष सत्र आयोजित किया गया। इसमें समस्या और आवश्यकता की पहचान, नवाचार, उत्पाद अथवा सेवा की उपयोगिता, USP (Unique Selling Proposition), ग्राहक की आवश्यकता, Seller–Buyer संवाद, संप्रेषण, प्रस्तुतीकरण तथा ब्रांडिंग जैसी अवधारणाओं को गतिविधियों के माध्यम से समझाया गया। इस दौरान प्रतिभागियों ने स्वयं विक्रेता और क्रेता की भूमिका निभाकर यह अनुभव किया कि किसी विचार को उपयोगी उत्पाद अथवा सेवा में बदलने के लिए केवल तकनीकी कौशल ही नहीं, बल्कि Communication,(संप्रेषण ), Collaboration (सहयोग )Critical Thinking(तार्किक चिंतन ) क्रिएटिविटी (रचनात्मकता )और Problem Solving(समस्या समाधान ) जैसे कौशल भी आवश्यक है।
पाँचवें और अंतिम दिवस पर प्रो. डॉ. आशीष सोनी द्वारा कौशल बोध के अंतर्गत विभिन्न व्यावसायिक विषयों को Core Curriculum से जोड़ने, Bagless Days तथा Hub & Spoke Model की अवधारणा और इनके व्यावहारिक क्रियान्वयन पर विस्तृत चर्चा की गई। विशेष रूप से 10 Bagless Days को केवल विद्यालय से बाहर भ्रमण के रूप में न देखकर बच्चों को स्थानीय व्यवसायों, कार्यस्थलों, कारीगरों, कृषि, सेवा क्षेत्र तथा समुदाय के वास्तविक कार्य-जगत से परिचित कराने के सार्थक अवसर के रूप में विकसित करने पर बल दिया गया।
प्रतिभागियों द्वारा अपने-अपने विद्यालयों में कौशल बोध तथा व्यावसायिक शिक्षा के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए तैयार कार्य योजनाएं प्रस्तुत की गई । इस प्रक्रिया ने पाँच दिनों में प्राप्त अधिगम को विद्यालय स्तर की वास्तविक कार्ययोजना में परिवर्तित करने का अवसर दिया । प्रतिभागियों ने कार्यशाला को अत्यंत उपयोगी, व्यावहारिक और अपने दैनिक जीवन तथा विद्यार्थियों के शिक्षण-अधिगम से सीधे जुड़ा हुआ बताया। विशेष रूप से Hands-on Activities, Exposure Visit, Learning by Doing और उद्यमशील मानसिकता से संबंधित गतिविधियों को अत्यंत उपयोगी अनुभव के रूप में रेखांकित किया गया। इस अवसर पर बंदना गर्बयाल निदेशक अकादमिक शोध और प्रशिक्षण उत्तराखंड ने आशा व्यक्त की कि यह कार्यशाला अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने में सफल होगी और शिक्षकों के साथ बच्चों में भी उद्यमशील मानसिकता का विकास करने में भी सफल होगी।
समापन सत्र में अपर निदेशक, SCERT उत्तराखण्ड पद्मेंद्र सकलानी द्वारा प्रतिभागियों को संबोधित करते हुए राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 की भावना के अनुरूप विद्यालयों में कौशल बोध, व्यावसायिक शिक्षा और उद्यमशील मानसिकता को प्रभावी रूप से विकसित करने पर बल दिया गया। उन्होंने शिक्षकों से अपेक्षा की कि पाँच दिनों में अर्जित अनुभवों को केवल प्रशिक्षण तक सीमित न रखते हुए विद्यालयों और विद्यार्थियों तक पहुँचाया जाए तथा बच्चों को अपने हाथों से काम करने, स्थानीय कौशलों को समझने, समस्याओं के समाधान खोजने और नवाचार करने के अधिकाधिक अवसर दिए जाएँ। कार्यशाला के समन्वयंन और दो प्रशिक्षण सत्रों के संचालन के संबंध में प्रोफेसर सोनी और डॉ रवि आहूजा ने समन्वयक सुनील भट्ट की सराहना की । 
पाँच दिवसीय कार्यशाला ने इस विचार को और मजबूत किया कि भविष्य की शिक्षा में ज्ञान और कौशल अलग-अलग नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। बच्चा गणित, विज्ञान और भाषा जाने—लेकिन साथ ही वह अपने ज्ञान का उपयोग वास्तविक जीवन की समस्या को पहचानने, उसका समाधान खोजने, टीम के साथ कार्य करने और कुछ नया सृजित करने में भी कर सके। यही कौशल बोध और व्यावसायिक शिक्षा की वास्तविक भावना है। कार्यशाला में डॉक्टर के एन विज्ल्वाण सहायक निदेशक एस. सी. ई. आर. टी उत्तराखंड ने व्यावसायिक शिक्षा के क्रियान्वयन पर बल दिया।
बकौल सुनील भट्ट कार्यशाला समन्वयक यह कार्यशाला
> “जानने से करने तक, कक्षा से कार्य-जगत तक और ज्ञान से कौशल तक की कौशल बोध यात्रा है।”






