*मातृभाषा कुमाउनी में सुंदर सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के साथ हुआ कक्षाओं का समापन*
उत्तराखंड लोक भाषा साहित्य मंच, दिल्ली के तत्वावधान में उत्तरखंडी(गढ़वाली,कुमाउनी, जंनसारी) भाषाओं की ग्रीष्मकालीन शिक्षण कक्षाएं – 2026 के तहत 17 अप्रैल, 2026 से रविवार और सार्वजनिक अवकाशों के दिनों में सी.आर.सी. केन्द्र – बासोट,क्षेत्र -भिकियासैंण (अल्मोड़ा) में संचालित की गई थी। इन कक्षाओं का समापन बच्चों की कुमाउनी भाषा में प्रस्तुतियों के साथ किया गया। केन्द्र प्रमुख कृपाल सिंह शीला व सहयोगी कुमाउनी भाषा शिक्षक प्रेम प्रकाश द्वारा सभी बच्चों से अपनी मातृभाषा, दुदबोलि कुमाउनी का अपने घरों में बोलचाल में अधिक प्रयोग किये जाने के साथ अपनी पहचान के रुप में इसे संरक्षण प्रदान करने की बात पर जोर दिया। कुमाउनी भाषा की इन कक्षाओं में कुमाउनी में स्वपरिचय, रिश्ते – नाते, कहानी, कविता, नाटक, कहावत, किस्से, पहेली (आँण), उत्तराखंड के लोकपर्व (हरेला, घुघुतिया, घी सक्रान्ति), उत्तराखंड के लोकगीत , लोकगायक, उत्तराखंड की साहित्य -संस्कृति, खानपान, प्रमुख फसलें, उत्तराखंड के कुमाउनी साहित्यकार, उत्तराखंड में पर्यावरण के क्षेत्र में कार्य कर रहे प्रमुख व्यक्तित्व ,प्रमुख कृषि उपज,उत्तराखंड में लगने वाले मेले आदि के संबंध में जानकारी दी गई।इन कक्षाओं में दोतरफा संवाद के माध्यम से बच्चों में अपनी मातृभाषा के प्रति लगाव दिखाई दिया। इन कक्षाओं में 30 से अधिक बच्चों ने प्रतिभाग किया। सभी बच्चों को लोक भाषा मंच की तरफ से बैग,पैन,पैड़ व पहचान पत्र प्रदान किये गये। बच्चों के सूक्ष्म जलपान के लिए मातृभाषा, लोकभाषा प्रेमी डॉ.आर.के. ठकुराल द्वारा सहयोग प्रदान किया गया। कुमाउनी भाषा कक्षा के सफल संचालन के लिए कुमाउनी भषा कुमाऊं मंडल संयोजक कृपाल सिंह शीला ने सभी प्रतिभागियों, सभी सहयोगियों, सभी शिक्षकों सहित लोक भाषा साहित्य मंच, दिल्ली के संरक्षक विनोद बछेती, डीपीएमआई, दिल्ली,संयोजक दिनेश ध्यानी, भाषा कार्यशाला प्रबन्धन समिति के प्रमुख दयाल नेगी,रेखा चौहान,पूरनचन्द्र कांडपाल,गिरीश सत्यवली,पृथ्वी सिंह केदारखंड़ी,वंदना बिष्ट, जगमोहन ‘जगमोरा’,राजेन्द्र सिंह, रमेश हितैषी, जगमोहन सिंह रावत, रमेश सोनी का कुमाउनी धन्यवाद व्यक्त किया गया। कुमाउनी कक्षा के समापन अवसर पर सहयोगी शिक्षक प्रेम प्रकाश ने सभी प्रतिभागियों से घरों में अपनी मातृभाषा में बोलचाल करने का निवेदन किया।
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उत्तराखंडी भाषाओं की ग्रीष्म कालीन कक्षाएँ हुई सम्पन्न
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