उत्तराखण्ड, देहरादूनः
सौं-करार लोकभाषा साहित्यिक समिति, टीरि की ओर से अरविन्द ‘प्रकृति प्रेमी के दिशा-निर्देशन में राजधानी देहरादून में कविता साहित्य में वैज्ञानिकता पर विमर्श संगोष्ठी का आयोजन किया गया।
कार्यक्रम के बतौर मुख्य अतिथि डॉ0 इन्द्रमणी सेमवाल ने घनश्याम सैलानी की रचना का संदर्भ देते हुए कविता में वैज्ञानिकता की बात कही और जयशंकर प्रसाद की रचना कामायनी का उल्लेख किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ कवि जगमोहन सिंह जयाड़ा ‘जिज्ञासु’ने ढुंगा (पत्थर) का उदाहरण देकर कविता में कल्पना और विज्ञान की बात कही । उन्होंने तकनीकी लेखन पर भी अपनी बात रखी। संस्था के संस्थापक अध्यक्ष अरविन्द ‘प्रकृति प्रेमी ने शिल्प और कथ्य दोनों के आधार पर कविता में वैज्ञानिकता- वैज्ञानिक तथ्यों, तार्किकता, यथार्थ के साथ कल्पना और संवेदना के समावेश पर बल दिया। उन्होंने कविता में वैज्ञानिकता की विशेषताएं और कविता में वैज्ञानिकता के समावेश के लिए तरीके सुझाए जिसमें रूपकों के वैज्ञानिक प्रयोग, प्राकृतिक घटनाओं का तार्किक चित्रण, रूढि और अंधविश्वास पर प्रहार, आधुनिक तकनीकी, विज्ञान के शब्दों के प्रयोग को रेखांकित किया। इस सन्दर्भ में उन्होने हिन्दी कविता साहित्य में वैज्ञानिकता के उदाहरणों के तौर पर नरेश सक्सेना की कविता- बड़े होकर क्या बनोगे?, डॉ0 राजेश पाल की कविता- हवा खा रहे हैं लोग नहीं जानते हवा की वजह, दिनेश डबराल ‘कूँतणी की कविता- जागो! का साहित्यिक परिचय दिया। वहीं दूसरी ओर गढ़वाली कविता साहित्य में मदन मोहन डुकलाण की कविता- आँदि जाँदि साँस, शांन्ति प्रकाश ‘जिज्ञासु’ की कविता अवसाद का भी साहित्यिक सन्दर्भ दिया। डॉ0 सत्यानन्द बडोनी ने वैज्ञानिक तथ्य, बाल साहित्य में विज्ञान की प्रमाणिकता कथ्य के साथ वैज्ञानिक तथ्य पर जोर दिया और चंदा मामा क्यों? तथा वैज्ञानिक रस, पर अपने साहित्यिक विचार रखे।
अर्चना गौड़ ने कहा कि कविता में जिज्ञासा पैदा करने वाले तत्व हों और अंधविश्वास से परे होने से वैज्ञानिकता होती है। विनीता मैठाणी ने कल्पना, निष्कर्ष समाज तक पहुँचने, कविता में तथ्य, रोचकता और सार्थकता अपनाने की बात कही। डॉ0 हर्षमणी भट्ट ने कविता में कल्पना से विज्ञान तक पर बात रखी। पानी का उदाहरण देकर शब्द-अर्थों पर जोर, और कविता सम्प्रेषणीयता की बात कही। अंजना कण्डवाल ‘नैना ने सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की कविता गुलाब का सन्दर्भ देते हुए वास्तविक अभिव्यक्ति से वैज्ञानिक बिम्ब और प्रतीक की बात की । उन्होंने अरविन्द ‘प्रकृति प्रेमी’ की कविता द्वी बंसत का जिक्र कर उसमें वैज्ञानिकता की बात कही और अर्चना गौड़ की कविता में भी इसका जिक्र किया। रक्षा बौड़ाई ‘हिलासं’ ने कविता में वैज्ञानिकता -विज्ञान कल्पना और तथ्य, कोरी कल्पना के परे चीजों को वैज्ञानिक दृष्टिकोण से साहित्यिक समावेश की बात कही और साहित्य में अच्छा प्रयोग बताया।
इस कार्यक्रम के दूसरे चक्र कविता पाठ भी हुआ जिसमें अर्चना गौड़ ने खैरी कि चलक्वार, विनीता मैठाणी ने एस. आई. आर, डॉ0 हर्षमणी भट्ट ने एक डूबदा शहर कि कथा-टिहरी, अजंना कण्डवाल ‘नैना’ ने डाळी कि व्यथा, अरविन्द ‘प्रकृति प्रेमी’ ने टुटणू शुभ!, ठैरण, डॉ0 सत्यानन्द बडोनी ने लगलि, जगमोहन सिंह जयाड़ा ‘जिज्ञासु ने झगुल्या, घत, रक्षा बौडाई ‘हिलांस’ ने घौ, रचनाओं का काव्य पाठ किया।
इस कार्यक्रम का संचालन रक्षा बौड़ाई ‘हिलासं ने किया। कार्यक्रम का उद्देश्य गढ़वाली कविता साहित्य में वैज्ञानिकता के तहत वैज्ञानिक रचनात्मकता को बढ़ावा देना, उसे विकसित करना और रचनाकारो की
रचनाधर्मिता पर विमर्श करना था ।
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कविता साहित्य में वैज्ञानिकता पर विमर्श संगोष्ठी आयोजित
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