उत्तराखंड, देहरादून।
जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान (डायट), देहरादून में प्राचार्य मंजू भारती के दिशा निर्देशन में आनन्दम पाठ्यचर्या पर आधारित चार दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम दो चरणों में 3–4 नवंबर 2026 तथा 5–6 नवंबर 2026 को आयोजित किया गया। कार्यक्रम में जनपद देहरादून के विभिन्न विद्यालयों से कुल 80 शिक्षक-शिक्षिकाओं ने भाग लिया।
प्रशिक्षण कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य शिक्षकों को आनन्दम पाठ्यचर्या की अवधारणा, उद्देश्यों एवं शिक्षण-शास्त्रों से परिचित कराते हुए विद्यालयों में इसके प्रभावी क्रियान्वयन के लिए सक्षम बनाना था। विद्यार्थियों में सामाजिक-भावनात्मक विकास, मानवीय मूल्यों, सकारात्मक दृष्टिकोण, आत्म-जागरूकता, संवेदनशीलता, सहानुभूति तथा जीवन कौशल विकसित करने के लिए शिक्षकों को प्रेरित करना भी कार्यक्रम का प्रमुख उद्देश्य रहा.
प्रशिक्षण कार्यक्रम के दौरान वन्दना गबर्याल, निदेशक, अकादमिक, शोध एवं प्रशिक्षण ने विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास में सामाजिक-भावनात्मक अधिगम और मानवीय मूल्यों की भूमिका पर विस्तार से प्रकाश डाला।
उन्होंने शिक्षकों को प्रेरित किया कि वे विद्यार्थियों में संवेदनशीलता, सहयोग, सहानुभूति, आत्मानुशासन, सकारात्मक सोच और मानवीय दृष्टिकोण विकसित करने के लिए नियमित प्रयास करें। उन्होंने विशेष रूप से निर्देशित किया कि विद्यालयों में आनन्दम पाठ्यचर्या का संचालन अनिवार्य रूप से प्रथम वादन (पीरियड) में किया जाए, जिससे विद्यार्थियों के दिन की शुरुआत सकारात्मक विचारों, भावनात्मक संतुलन और आनंदपूर्ण वातावरण के साथ हो सके।
उन्होंने इस बात पर बल दिया कि शिक्षा का उद्देश्य अकादमिक उपलब्धियाँ ही प्राप्त करना नहीं, बल्कि विद्यार्थियों को संवेदनशील, जिम्मेदार, विवेकशील और मानवीय मूल्यों से युक्त नागरिक बनाना भी है। प्राचार्य डायट मंजू भारती ने
प्रशिक्षण के दौरान आनन्दम पाठ्यचर्या की महत्ता और विद्यालयी शिक्षा में इसकी उपयोगिता पर विशेष जोर दिया।
उन्होंने कहा कि विद्यार्थियों के सामाजिक और भावनात्मक विकास को शिक्षा की मुख्यधारा में सम्मिलित करना समय की आवश्यकता है। आनन्दम पाठ्यचर्या विद्यार्थियों को स्वयं को समझने, अपनी भावनाओं को पहचानने, दूसरों के प्रति संवेदनशील बनने तथा सकारात्मक व्यवहार विकसित करने का अवसर देती है।
उन्होंने प्रतिभागियों से अपेक्षा की कि वे प्रशिक्षण में अर्जित ज्ञान और कौशल का उपयोग अपने विद्यालयों में प्रभावी ढंग से करें तथा आनन्दम पाठ्यचर्या को नियमित रूप से संचालित करते हुए विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास में योगदान दें।
दो दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम के समन्वयक डॉ. विजय सिंह रावत, प्रवक्ता, डायट देहरादून द्वारा प्रशिक्षण के प्रथम सत्र में आनन्दम पाठ्यचर्या की अवधारणा, उद्देश्यों एवं आवश्यकता पर विस्तारपूर्वक प्रकाश डाला गया। 
उन्होंने बताया कि आनन्दम पाठ्यचर्या विद्यार्थियों में आत्म-जागरूकता, आत्म-अनुशासन, सकारात्मक सोच, सामाजिक संवेदनशीलता, भावनात्मक संतुलन तथा मानवीय मूल्यों के विकास का एक महत्वपूर्ण माध्यम है। इसके माध्यम से विद्यार्थियों को स्वयं के अनुभवों, भावनाओं एवं विचारों को समझने तथा उन्हें सकारात्मक रूप में व्यक्त करने का अवसर मिलता है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि आनन्दम पाठ्यचर्या का उद्देश्य विद्यार्थियों को केवल ज्ञान प्रदान करना नहीं, बल्कि उन्हें जीवन की परिस्थितियों को समझने, उचित निर्णय लेने, दूसरों के साथ सहयोग करने तथा संवेदनशील एवं जिम्मेदार व्यवहार विकसित करने के लिए तैयार करना है।
डॉ. रावत ने प्रतिभागियों को प्रेरित किया कि वे आनन्दम पाठ्यचर्या को केवल एक निर्धारित वादन तक सीमित न समझें, बल्कि इसके मूल्यों एवं शिक्षण दृष्टिकोण को विद्यालय के समग्र वातावरण तथा दैनिक शिक्षण प्रक्रिया में भी समाहित करें।
प्रशिक्षण कार्यक्रम में लभ्या फाउण्डेशन से अमर चिखले, लवलीन, आरजू और मनीष तथा ड्रीम ए ड्रीम संस्था से पूनम जुयाल और इकराम ने संदर्भदाता के रूप में सहयोग दिया ।
संदर्भदाताओं द्वारा प्रशिक्षण को सहभागी, गतिविधि-आधारित और अनुभवात्मक बनाया गया। उन्होंने आनन्दम पाठ्यचर्या के अंतर्गत विद्यार्थियों में सामाजिक-भावनात्मक अधिगम, मानवीय मूल्यों एवं जीवन कौशल विकसित करने के लिए विभिन्न अभ्यासों और गतिविधियों का प्रदर्शन किया। प्रशिक्षण समन्वयक डॉ. रावत ने न्यूज ओसियन को बताया कि
प्रशिक्षण के दौरान आनन्दम पाठ्यचर्या के चार प्रमुख शिक्षण-शास्त्रों पर विशेष ध्यान दिया गया—
ध्यान देने की प्रक्रिया (Mindfulness): विद्यार्थियों में एकाग्रता, सजगता, आत्म-जागरूकता और मानसिक स्थिरता विकसित करने के लिए ध्यान आधारित अभ्यास।
कहानी (Story): कहानियों के माध्यम से मानवीय मूल्यों, नैतिकता, संवेदनशीलता, सहानुभूति एवं जीवन के महत्वपूर्ण संदेशों को समझना।
गतिविधि (Activity): सहभागिता, सहयोग, सामूहिकता एवं अनुभवात्मक अधिगम के माध्यम से सामाजिक-भावनात्मक कौशल विकसित करना।
अभिव्यक्ति (Expression): विद्यार्थियों को अपने विचारों, भावनाओं, अनुभवों एवं प्रतिक्रियाओं को स्वतंत्र रूप से व्यक्त करने के अवसर दे ना।
इन चारों शिक्षण-शास्त्रों के माध्यम से प्रतिभागियों को यह समझने का अवसर मिला कि आनन्दम पाठ्यचर्या को विद्यार्थियों के लिए किस प्रकार सहज, रोचक, आनंदपूर्ण और प्रभावी बनाया जा सकता है।
प्रशिक्षण के विभिन्न सत्रों में प्रतिभागियों को स्वयं गतिविधियों में सहभागिता करने, अनुभव साझा करने, समूह चर्चा करने तथा विभिन्न परिस्थितियों पर चिंतन करने के अवसर दिए गए।
शिक्षकों ने ध्यान आधारित अभ्यासों, कहानी-कथन, समूह गतिविधियों एवं अभिव्यक्ति से संबंधित अभ्यासों में सक्रिय सहभागिता की। इन गतिविधियों के माध्यम से उन्होंने यह अनुभव किया कि विद्यार्थियों को अपनी भावनाओं एवं विचारों को समझने तथा व्यक्त करने के लिए सुरक्षित, सहज एवं सहयोगपूर्ण वातावरण देना कितना महत्वपूर्ण है।
प्रशिक्षण में इस बात पर विशेष बल दिया गया कि शिक्षक विद्यार्थियों के साथ संवेदनशील व्यवहार करें। उनकी भावनाओं को सम्मान दें तथा कक्षा में ऐसा वातावरण बनाएं जहाँ प्रत्येक विद्यार्थी स्वयं को सुरक्षित, स्वीकार्य और महत्वपूर्ण महसूस करे।
प्रशिक्षण कार्यक्रम के संचालन में डायट देहरादून के प्रवक्ता प्रणय बहुगुणा और शिशुपाल बिष्ट द्वारा विशेष सहयोग दिया गया।






