डोईवाला, कालसी और विकास नगर विकासखण्ड की आँगनवाड़ी कार्यकत्रियों को डायट देहरादून में दिया गया प्रशिक्षण

उत्तराखंड, देहरादून।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 में पूर्व बाल्यावस्था देखभाल एवं शिक्षा (Early Child Care and Education ) को बच्चों के समग्र और संतुलित विकास की आधारशिला के रूप में विशेष महत्व दिया गया है। 3–8 वर्ष की आयु अवधि में बच्चों के शारीरिक, सामाजिक-भावनात्मक, भाषाई, संज्ञानात्मक तथा सृजनात्मक विकास के लिए अनुभवात्मक, गतिविधि-आधारित और खेल-आधारित अधिगम अत्यंत प्रभावी माना जाता है।
इसी क्रम में आंगनबाड़ी केन्द्रों को बच्चों के लिए आनंददायी, सुरक्षित, समावेशी और सीखने के अवसरों से समृद्ध बनाने तथा स्थानीय स्तर पर उपलब्ध संसाधनों के प्रभावी उपयोग के लिए जादुई पिटारा तथा ई-जादुई पिटारा की अवधारणा अत्यंत उपयोगी है। इसी उद्देश्य से जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान (डायट), देहरादून में दिनांक 11 एवं 12 सितंबर 2026 को दो दिवसीय प्रशिक्षण का आयोजन किया गया।
प्रशिक्षण में विकासखण्ड डोईवाला, कालसी और विकासनगर की कुल 60 आंगनबाड़ी कार्यकत्रियों ने भाग लिया । प्रशिक्षण का प्रमुख उद्देश्य प्रतिभागियों को जादुई पिटारा और ई-जादुई पिटारा की अवधारणा, उपयोगिता और गतिविधियों से परिचित कराना तथा आंगनबाड़ी केन्द्रों के लिए स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप स्वयं की शिक्षण-अधिगम सामग्री विकसित करने में सक्षम बनाना था। बकौल डॉ. विजय सिंह रावत मुख्य सन्दर्भदाता, कार्यशाला में प्रतिभागियों को
जादुई पिटारा और ई-जादुई पिटारा की अवधारणा तथा उपयोगिता को समझाने के साथ ही
राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के संदर्भ में बालवाटिका और ECCE की अवधारणा को स्पष्ट करने पर भी बल दिया गया।
प्रशिक्षण के प्रथम दिवस डां. विजय सिंह रावत, मुख्य संदर्भदाता द्वारा प्रतिभागियों का पंजीकरण एवं परिचयात्मक गतिविधि के साथ प्रशिक्षण का प्रारम्भ किया गया। इस अवसर पर प्रशिक्षण के उद्देश्यों, अपेक्षित अधिगम परिणामों तथा प्रशिक्षण की कार्ययोजना पर चर्चा की गई।

पहले सत्र में जादुई पिटारा की अवधारणा पर विस्तृत चर्चा की गई। प्रतिभागियों को बताया गया कि जादुई पिटारा केवल सामग्री का एक बॉक्स नहीं है, बल्कि बच्चों के लिए विभिन्न प्रकार के खेल, गतिविधियों, चित्रों, कार्ड, कहानी, गीत, पहेलियों, गणितीय सामग्री और अन्य अनुभवात्मक संसाधनों का ऐसा संग्रह है, जिसके माध्यम से बच्चे खेल खेल में अनुभव प्राप्त करते हुए सीखते हैं।
प्रतिभागियों ने उपलब्ध सामग्री का अवलोकन करते हुए यह समझने का प्रयास किया कि एक ही सामग्री का उपयोग विभिन्न विकासात्मक क्षेत्रों में किस प्रकार किया जा सकता है।
इसके बाद ई-जादुई पिटारा के संबंध में प्रतिभागियों को जानकारी दी गई। डिजिटल माध्यमों में उपलब्ध गतिविधियों और संसाधनों को आंगनबाड़ी केन्द्रों तथा बालवाटिका में बच्चों के सीखने के लिए उपयोग किए जाने के विभिन्न तरीकों पर चर्चा की गई।
प्रतिभागियों को डिजिटल संसाधनों का उद्देश्यपूर्ण उपयोग करते हुए बच्चों को सक्रिय रूप से जोड़ने, केवल स्क्रीन देखने तक सीमित न रखने तथा डिजिटल गतिविधियों को वास्तविक जीवन की गतिविधियों से जोड़ने पर विशेष बल दिया गया।
अगले सत्र में डां. रावत ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के संदर्भ में बालवाटिका कक्षा पर चर्चा की । बालवाटिका को विद्यालयी शिक्षा की तैयारी के रूप में देखने के साथ-साथ बच्चों के सर्वांगीण विकास, खेल-आधारित अधिगम, अनुभवात्मक अधिगम तथा आनंददायी वातावरण की आवश्यकता पर विचार-विमर्श किया गया।
प्रतिभागियों ने चर्चा के माध्यम से यह समझ विकसित की कि छोटे बच्चों के लिए सीखना किसी औपचारिक पाठ्यपुस्तक-केन्द्रित प्रक्रिया के बजाय खेल, कहानी, गीत, बातचीत, गतिविधि एवं आसपास के परिवेश से जुड़ा होना चाहिए।
इस सत्र में बच्चों की सीखने की प्रकृति पर चर्चा की गई। प्रतिभागियों को गतिविधियों के माध्यम से यह अनुभव कराया गया कि बच्चे—
देखकर,
सुनकर,
छूकर,
करके,
खेलकर,
प्रश्न पूछकर,
दूसरों से बातचीत करके तथा
अपने अनुभवों को साझा करके
अधिक प्रभावी ढंग से सीखते हैं।
इस दौरान बाल केन्द्रित और अनुभवात्मक अधिगम को आंगनबाड़ी केन्द्र की दैनिक गतिविधियों में शामिल करने पर विशेष बल दिया गया।
प्रशिक्षण में BALA (Building as Learning Aid) की अवधारणा पर भी विस्तृत चर्चा की गई। प्रतिभागियों को बताया गया कि आंगनबाड़ी केन्द्र की दीवारें, फर्श, दरवाजे, खिड़कियां, सीढ़ियां और अन्य स्थान बच्चों के लिए सीखने के संसाधन के रूप में उपयोग किए जा सकते हैं।
प्रतिभागियों से स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार ऐसे विचार साझा करवाए गए जिनके माध्यम से आंगनबाड़ी केन्द्र को अधिक आकर्षक, बाल-अनुकूल तथा सीखने के अवसरों से युक्त बनाया जा सके.
संदर्भदाता शशि पोखरियाल ने खेल को बाल्यावस्था में सीखने का स्वाभाविक माध्यम बताते हुए विभिन्न प्रकार के खेलों और गतिविधियों पर चर्चा की । प्रतिभागियों ने स्वयं खेलों में भाग लेकर उनके उद्देश्यों एवं बच्चों के विकास से संबंध को समझा।
खेलों के माध्यम से शारीरिक समन्वय, सामाजिक कौशल, भाषा, समस्या समाधान, तार्किक चिंतन और सृजनात्मकता के विकास पर चर्चा की गई।

दूसरे दिवस की शुरुआत डां. विजय सिंह रावत ने पूर्व दिवस में किए गए कार्यों के पुनरावलोकन और प्रतिभागियों के अनुभव साझा करने से की ।
भाषाई विकास सत्र में बच्चों में सुनने, बोलने, समझने और अभिव्यक्त करने की क्षमता के विकास के लिए विभिन्न गतिविधियों पर चर्चा की गई।
कहानी-कथन, चित्र वार्ता, वस्तु पहचान, शब्द खेल, बातचीत, प्रश्नोत्तर, बालगीत एवं स्थानीय संदर्भों से जुड़ी गतिविधियों के माध्यम से बच्चों की भाषा को समृद्ध करने के उपायों पर विचार किया गया।
प्रतिभागियों को इस बात के लिए प्रोत्साहित किया गया कि वे बच्चों को बोलने के पर्याप्त अवसर दें तथा उनकी भाषा और अभिव्यक्ति को सुधारने के बजाय प्रोत्साहित करने का वातावरण निर्मित करें।
बुनियादी संख्या ज्ञान के विकास के लिए स्थानीय और सरल शिक्षण-अधिगम सामग्री के निर्माण तथा प्रयोग पर चर्चा की गई।
गिनती, मिलान, वर्गीकरण, क्रमबद्धता, अधिक-कम, समान-असमान, आकृति पहचान तथा संख्या एवं मात्रा के संबंध को खेल और गतिविधियों के माध्यम से समझाने के उदाहरण प्रस्तुत किए गए।
प्रतिभागियों ने उपलब्ध स्थानीय सामग्री का उपयोग करते हुए संख्या ज्ञान से संबंधित सामग्री तैयार की तथा उसके प्रयोग का प्रदर्शन किया।
प्रशिक्षण में सुरक्षित आंगनबाड़ी केन्द्र की अवधारणा को विशेष महत्व दिया गया। केन्द्र के भौतिक और भावनात्मक वातावरण को बच्चों के लिए सुरक्षित बनाने के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की गई।
बच्चों की सुरक्षा, स्वच्छता, सुरक्षित खेल क्षेत्र, सामग्री की सुरक्षित व्यवस्था, दुर्घटना की संभावनाओं को कम करने तथा बच्चों के साथ संवेदनशील एवं सम्मानजनक व्यवहार को सुरक्षित वातावरण का आवश्यक अंग बताया गया.
बालगीत और भावगीत के माध्यम से बच्चों के भाषाई, भावनात्मक, सामाजिक तथा सृजनात्मक विकास पर चर्चा की गई। प्रतिभागियों ने विभिन्न बालगीतों एवं भावगीतों का अभ्यास किया तथा यह समझा कि गीतों को केवल मनोरंजन के रूप में नहीं बल्कि सीखने के प्रभावी माध्यम के रूप में भी प्रयोग किया जा सकता है।
स्थानीय परिवेश, प्रकृति, परिवार, पशु-पक्षी, रंग, संख्या एवं दैनिक जीवन से जुड़े गीतों को गतिविधियों के साथ जोड़ने के तरीके साझा किए गए।
प्रशिक्षण का सबसे महत्वपूर्ण और व्यावहारिक पक्ष प्रत्येक आंगनबाड़ी केन्द्र के लिए स्वयं का जादुई पिटारा तैयार करना रहा।
कार्यक्रम समन्वयक प्रणय बहुगुणा ने प्रतिभागियों को विभिन्न समूहों में विभाजित कर स्थानीय और आसानी से उपलब्ध सामग्री जैसे—
कार्डबोर्ड,
पुराने डिब्बे,
कागज एवं चार्ट,
कपड़े के टुकड़े,
आइसक्रीम स्टिक,
बोतल के ढक्कन,
रंगीन कागज,
स्थानीय प्राकृतिक सामग्री,
चित्र, फ्लैश कार्ड
आदि का उपयोग करते हुए शिक्षण-अधिगम सामग्री तैयार करने के लिए प्रेरित किया ।
प्रतिभागियों द्वारा भाषा विकास, संख्या ज्ञान, रंग एवं आकृति पहचान, वर्गीकरण, मिलान, क्रमबद्धता, कहानी-कथन, खेल एवं अन्य गतिविधियों से संबंधित सामग्री विकसित की गई।
प्रत्येक समूह ने तैयार सामग्री का प्रदर्शन किया तथा उसके उद्देश्य, उपयोग की प्रक्रिया और बच्चों से अपेक्षित अधिगम पर चर्चा की। इस गतिविधि से प्रतिभागियों में करके सीखने, सहयोगात्मक कार्य, सृजनात्मकता एवं स्थानीय संसाधनों के उपयोग की भावना विकसित हुई. प्रशिक्षण के समापन अवसर पर बिपिन भट्ट, प्रभारी प्राचार्य, डायट देहरादून द्वारा प्रतिभागियों को संबोधित किया गया। उन्होंने प्रशिक्षण में प्रतिभागियों की सक्रिय सहभागिता, सामग्री निर्माण और गतिविधि-आधारित कार्यों की सराहना करते हुए प्रशिक्षण से प्राप्त अनुभवों को अपने-अपने आंगनबाड़ी केन्द्रों पर प्रभावी रूप से लागू करने का आह्वान किया।
उन्होंने इस बात पर विशेष बल दिया कि आंगनबाड़ी केन्द्र बच्चों के लिए केवल देखभाल का स्थान न होकर खेल, आनंद, अनुभव एवं सीखने का जीवंत केन्द्र बने। जादुई पिटारा एवं ई-जादुई पिटारा के प्रभावी उपयोग से बच्चों को उनकी आयु एवं विकासात्मक आवश्यकताओं के अनुरूप आनंददायी अधिगम के अवसर प्रदान किए जा सकते हैं.

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