*”नारी तुम क्या -क्या ना करती”*
कभी माॅं का स्नेहिलआंचल
ममता की तान लिए लोरी
कभी जगमग लक्ष्मी बनकर
बांधे मृदु रेशम की डोरी।
कभी भार्या बन भय हरती
नारी तुम क्या -क्या ना करती।
रिश्तों के रूप विविध लेकर
जीवन के जटिल सवालों को
अपनी कोमल जीवटता से
हर पल कैसे तुम हल करती?
नारी तुम क्या -क्या ना करती।
हम थक जाते आलस लेकर
पर तुम सदैव चलती रहती
अपनी संतति हित तुम तत्पर
अपने सपने भी लुटा देती
नारी तुम क्या -क्या ना करती।
जीवन -प्रांगण का हर कोना
ममता-निकषा से बने सोना
जीवन से भय बाधाओं को
हरकर जीवन निर्भय करती
नारी तुम क्या -क्या ना करती।
तुम कल्याणी तुम ही धात्री
दुष्टों की हो तुम कालरात्रि
तुम ही विद्या तुम ही शक्ति
परहित तुम रूप धरा करती
नारी तुम क्या -क्या ना करती।
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– कवि जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान (डायट) नैनीताल, भीमताल में प्रवक्ता पद पर कार्यरत हैं.






