पौराणिक आख्यानो से जुडा है भीमताल और आस -पास का क्षेत्र -डॉ. उमेश चमोला

                                                           
‘‘हर कंकर में शंकर है।‘‘  -यह उक्ति देवभूमि उत्तराखण्ड में स्थित धार्मिक स्थलों के महात्म्य को व्यक्त करती है। बद्रीनाथ,केदारनाथ,गंगोत्री और यमुनोत्री इन चारधामों के अलावा यहाँ  अनगिनत ऐसे स्थल हैं जो प्राकृतिक सौन्दर्य से भरपूर होने के साथ-साथ ऐतिहासिक एवं पौराणिक आख्यानो तथा अनेक किवदन्तियों से भी सम्बन्धित हैं। इस आलेख में ऐसे ही पर्यटक एवं तीर्थस्थल भीमताल और इसके पास के तालों पर प्रकाश डाला गया है। कुमाऊॅ मण्डल में  भीमताल समुद्र तल से 1370 मी की ऊॅचाई पर स्थित है। उत्तराखण्ड में सरोवर नगरी नैनीताल पर्यटक स्थल के रूप में प्राचीन काल से ही जाना जाता रहा है। ब्रिटिश भारत में यूनाइटेंड प्रोविन्सिेज ऑफ इण्डिया की ग्रीष्मकालीन राजधानी के रूप में जानी जाने वाली सरोवर नगरी नैनीताल में आज भी कई पर्यटक प्रतिवर्ष आते हैं किन्तु नैनीताल के समीप स्थित भीमताल,सातताल,नल दमयन्तीताल और नौकुचियाताल के बारे में जानकारी न होने के कारण आम पर्यटक इनके भ्रमण से वंचित रह जाते हैं।
कैसे पहुंचें भीमताल
   हरिद्वार से 284 किमी की दूरी पर रेल मार्ग से हल्द्वानी नामक स्थान पड़ता है। हल्द्वानी से 40 किमी आगे अल्मोड़ा मार्ग पर भीमताल स्थित है। भीमताल से चार-पांच  किमी की दूरी पर नौकुचियाताल( नौ कोनो वाला ताल) पड़ता है। भीमताल से रोडवेज की बस या जीप द्वारा आप आसानी से नौकुचियाताल पहुॅच सकते हैं। यहाॅ आकर आप कमल के फूलों की छटा निहार सकते हैं। भीमताल से आगे सात किमी की दूरी पर एक छोटा सा ताल पड़ता है। इसे नल-दमयन्ती ताल कहते हैं। इस ताल से आगे छोटे-छोटे सात ताल पास-पास दिखाई देते हैं। इन्हें सात ताल कहा जाता है। भीमताल से आठ-दस किमी की दूरी पर भवाली नामक स्थान पड़ता है। यहाँ  से लगभग इतनी ही दूरी पर नैनीताल पड़ता है जो मल्लीताल और तल्लीताल के रूप में स्थित है। इसलिए आप जब कभी नैनीताल आने का कार्यक्रम बनाएं तो भीमताल,नौकुचियाताल,नल-दमयन्तीताल होकर ही नैनीताल आयें । आपको भीमताल ,नैनीताल की तुलना में अधिक शान्त लगेगा।
     भीमताल के बारे में किवदन्ती है कि यहाँ  आकर भीम को प्यास लगी थी । भीम ने गदे से इस स्थान पर मारा था । इससे यहाँ  एक बड़ा ताल बन गया। यही ताल भीमताल कहा जाने लगा। जिस स्थान पर भीम ने गदा रखा था,वहाँ मिट्टी शेष रह गई थी । यह स्थान टापू के रूप में अस्तित्व में आ गया। इस टापू वाली जगह पर वर्तमान में एक एक्वेरियम बनाया गया है। यहाँ  अनेक प्रकार की मछलियों को देखा जा सकता है।
    इस ताल के किनारे भीमेश्वर महादेव का मन्दिर है। मान्यता है कि अज्ञातवास के समय पाण्डवों ने इसका निर्माण किया था। सत्रहवीं शताब्दी में चन्द वंश के राजा बाज बहादुर ने इसे नया रूप दिया था ।  यहाँ  के लोगों का कहना है कि इस क्षेत्र में सांप किसी को नहीं डंसता।  आज तक किसी को भी सांप  के डंसने का समाचार नहीं है। इसका कारण कड़कोटक नाग का राजा नल को दिया हुआ वरदान माना जाता है।  कहा जाता है राजा नल को शनि की साढ़े साती में अपना राजपाठ गंवाना पड़ा था। वह शत्रुओं से जान बचाकर भीमताल से आगे की ओर भाग कर आए थे । उन्होंने यहाँ  एक नाग को जलते हुए देखा था । यह कड़कोटक नाग था। नल ने आग में कूदकर कड़कोटक को बचाया था । कड़कोटक ने समझा कि उसे आग में जलाने में नल का ही हाथ है। उसने अचानक नल को डंस लिया था। बाद में कड़कोटक को पछतावा हुआ। उसने नल के शरीर से सारा जहर चूसकर उसे बचा दिया ।  नल बच गए थे किन्तु जलने के कारण उनका शरीर काला पड़  गया। नल को खोजते हुए उनके शत्रु यहाँ  तक भी पहुच गए किन्तु जले शरीर को  देखकर वे नल को पहचान नहीं पाए। यहीं कड़कोटक ने नल को वरदान दिया था कि इस पूरे क्षेत्र में सांप किसी को नहीं डंसेगा। स्थानीय लोगों का मानना है कि इस क्षेत्र में आज तक किसी भी व्यक्ति को सांप ने नहीं डंसा है | शायद इसका कारण यहाँ जलीय क्षेत्र का होना है | अधिकांश जलीय सांप विषहीन होते हैं | कड़कोटक नाग केंचुली माता का पुत्र माना जाता है। केंचुली माता  का वर्णन स्कन्द पुराण के मानस खण्ड में आया है। भीमताल के किनारे केंचुली माता का छोटा सा मन्दिर है। माना जाता है कि इसे पांच हजार साल पहले द्वापर युग में नागवंशी राजा ऋतु प्रणय ने बनाया था। माना जाता है इस स्थान पर स्नान करने से त्वचा के रोग दूर हो जाते हैं।
   शनि की साढे़ साती के समय नल दमयन्ती के साथ भटकते भटकते  भीमताल से आगे उस स्थान पर पहुंचे जहाँ  आज नल-दमयन्ती ताल है। कहा जाता है राजा नल को यहाँ  जोर की भूख लगी थी। उन्हें खाने को कुछ नहीं मिला तो उन्होंने इस ताल की मछलियों को खाना शुरू किया। मछलियों का मुंह कटने के बाद वे नल के हाथ से फिसलकर ताल में गिर पड़ी। यहाँ  के लोगों का कहना है कि कुछ साल पहले तक यहाँ  कटे मुंह  जैसी मछलियां  देखने को मिलती थी किन्तु अब नहीं पाई जाती। भीमताल से लगभग दस किमी आगे नौकुचियाताल पड़ता है | बताया जाता है कि इस ताल के नौ कोने हैं | एक बार में कोई इन नौ कोनो को देख नहीं पाता है | नौकुचियाताल के पास ही कमलताल है | इस ताल में कई  कमल एक साथ देखे जा सकते हैं | 
   भीमताल और इसके आस-पास का क्षेत्र नैनीताल की तरह विकसित तो नहीं हो पाया है किन्तु यहाँ का प्राकृतिक सौन्दर्य नैनीताल से किसी भी मायने में कम नहीं है।

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