राजकीय इंटर कॉलेज खरोड़ा के बच्चों ने नैटवाड़ मोरी हाइड्रो इलेक्ट्रिक प्रोजक्ट का शैक्षिक भ्रमण कर विद्युत उत्पादन से सम्बंधित जानकारी प्राप्त की। शैक्षिक भ्रमण से पहले भ्रमण कार्यक्रम के प्रभारी सतपाल चौहान ने बच्चों से कहा कि वे भ्रमण के समय विभिन्न सूचनाओं का संकलन कर रिपोर्ट तैयार करेंगे जिसे भ्रमण के बाद विद्यालय में साझा किया जाना है। युद्धवीर चौहान ने कहा कि शैक्षिक भ्रमण से हमें बहुत कुछ सीखने को मिलता है। इसलिए भ्रमण से सम्बंधित सूचनाओं को सावधानी से संकलित करना चाहिए। बच्चों का भ्रमण दल सबसे पहले राष्ट्रीय राजमार्ग 707A देहरादून त्यूनी से होते हुए त्यूनी से पांच किमी आगे मैंद्रथ पहुंचा। यहाँ दल ने बाशिक महाराज के दर्शन किए। मैंद्रथ तिराहे पर सैराम पार्क में बच्चों ने सैराम सेमवाल की मूर्ति को देखा। स्थानीय लोगों ने भ्रमण दल को जानकारी देते हुए बताया कि यह मूर्ति हुणाभाट के वंशज मोहनलाल सेमवाल द्वारा बनवाई गई है। मोहनलाल सेमवाल सैराम सेमवाल के पुत्र हैं। वे वर्तमान में महासू देवता हनोल के कुलपुरोहित हैं। यह मूर्ति उत्तरकाशी के गाँव गमरी के निवासी राकेश रावत द्वारा बनाई गई है। यह माना जाता है कि हुणाभाट कठोर तपस्या से जन कल्याण के लिए चार भाई महासू महाराज को मैंद्रथ और हनोल लाये थे। हनोल मंदिर के देवमाली अनिरुद्ध रावत ने भ्रमण दल को बताया कि यह मंदिर टोंस नदी के किनारे स्थित है। इस मंदिर में अमृत जल की एक अदृश्य धारा बहती है। पौराणिक कथाओं में चार महासू देवताओं का सम्बन्ध शिवपुत्र कार्तिकेय से भी जोड़ा गया है। इन चार भाइयों को बाशिक महाराज, बौठा महाराज, पवासी और चालदा महाराज के नाम से जाना जाता है। हनोल मंदिर में लोहे के दो गोले रखे गए हैं। इन्हें भीम के कंचे कहा जाता है। इन कंचों को दोनों हाथों से उठाना बहुत मुश्किल होता है। हनोल मंदिर के दर्शन के बाद भ्रमण दल नैटवाड़ मोरी हाइड्रो इलेक्ट्रिक पॉवर प्रोजक्ट पहुंचा। इस प्रोजक्ट के तकनीकी विशेषज्ञ विवेक चंद और अन्य विशेषज्ञों ने बताया कि यह 60 मेगावाट की जल विद्युत परियोजना टोंस नदी पर स्थित है। इस परियोजना का निर्माण कार्य 2018 में शुरू हुआ था। इस टनल की लम्बाई 4.33 किमी और ऊँचाई 57.33 मीटर है। इस विद्युत परियोजना से 265.5 गीगावाट बिजली का उत्पादन हो रहा है। यह जल विद्युत परियोजना SJVN लिमिटेड व केंद्र सरकार के सहयोग से संचालित की गई। इस प्रोजेक्ट के भ्रमण के बाद भ्रमण दल वापस खुनीगाड़ पहुँचा । यहाँ बच्चों ने एशिया की सबसे ऊँची चीड़ वृक्ष की समाधि देखी। इसकी ऊँचाई 60.65 मीटर और गोलाई 2.70मीटर है। वृक्ष के छोटे -छोटे टुकड़े काटकर समाधि स्थल के अंदर रखे गए हैं। शैक्षिक भ्रमण में विद्यालय के शिक्षक सतबीर सिंह, आरती शर्मा, ममता कुकरेती और प्रेम राणा ने बच्चों की जिज्ञासा को शांत किया।
|
|






